Prayagraj Bulldozer सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी (PDA) द्वारा 2021 में की गई बुलडोजर कार्रवाई पर कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने इस कार्रवाई को अमानवीय और अवैध बताते हुए प्रशासन को पीड़ितों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
यह मामला तब सामने आया जब प्रयागराज प्रशासन ने गैंगस्टर अतीक अहमद की संपत्ति समझकर 5 निर्दोष नागरिकों के घर गिरा दिए। इसमें एक वकील, एक प्रोफेसर और तीन अन्य लोग शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को प्रशासन की बड़ी लापरवाही करार दिया और कहा कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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Prayagraj Bulldozer सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
Prayagraj Bulldozer सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इस मामले में बेहद कड़े शब्दों में टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:
- “देश में इस तरह से लोगों के रिहायशी मकानों को नहीं गिराया जा सकता।”
- “यह मामला हमारी अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है।”
- “प्रशासन को कार्रवाई करने से पहले सही जांच-पड़ताल करनी चाहिए थी।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति का घर गिराने से पहले उचित नोटिस देना जरूरी होता है और बगैर जांच के इस तरह की कार्रवाई प्रशासनिक तानाशाही के समान है।
गलत पहचान के कारण निर्दोष लोगों के घर तोड़े गए
Prayagraj Bulldozer 2021 में प्रयागराज प्रशासन ने गैंगस्टर अतीक अहमद की संपत्ति समझकर 5 लोगों के मकान गिरा दिए थे। पीड़ितों में शामिल थे:
- वकील जुल्फिकार हैदर
- प्रोफेसर अली अहमद
- तीन अन्य निर्दोष नागरिक
पीड़ितों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट का मुआवजे का आदेश
Prayagraj Bulldozer सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी को 6 हफ्तों के भीतर प्रत्येक पीड़ित को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा कि गलती प्रशासन की थी और इसकी भरपाई करना जरूरी है।
24 मार्च 2024 की घटना का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यूपी के अंबेडकर नगर में 24 मार्च 2024 को हुई एक दिल दहला देने वाली घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा:
“जब अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत झोपड़ियों पर बुलडोजर चलाया जा रहा था, उस दौरान एक 8 साल की बच्ची अपनी किताबें लेकर भाग रही थी। यह तस्वीर दिल दहला देने वाली थी और पूरे देश को हिला कर रख दिया था।”
कोर्ट ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि बुलडोजर कार्रवाई करते समय प्रशासन को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
नोटिस देने की प्रक्रिया पर उठे सवाल
Prayagraj Bulldozer सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार की तरफ से दावा किया गया कि मकान गिराने से पहले पीड़ितों को नोटिस भेजा गया था और उन्हें जवाब देने का पर्याप्त समय दिया गया था।
लेकिन इस पर जस्टिस ओका ने नाराजगी जताते हुए कहा:
- “अगर प्रशासन को नोटिस भेजना था, तो इसे सही तरीके से भेजा जाना चाहिए था।”
- “नोटिस चिपकाने की बजाय इसे कूरियर से क्यों नहीं भेजा गया?”
- “क्या कोई भी इस तरह नोटिस देगा और फिर सीधे मकान तोड़ देगा?”
कोर्ट ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर अत्याचार का उदाहरण है और प्रशासन को जवाबदेही तय करनी होगी।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकार और प्रयागराज प्रशासन को इस मामले में जवाब देना होगा। उन्हें:
- 6 हफ्तों के भीतर पीड़ितों को मुआवजा देना होगा।
- भविष्य में बिना जांच-पड़ताल किसी भी मकान को गिराने से बचना होगा।
- इस तरह की कार्रवाई के लिए उचित प्रक्रिया अपनानी होगी।
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